अवज्ञया यदहसदुच्चकैर्बलः
समुल्लसद्दशनमयूखमण्डलः ।
रुषारुणीकृतमपि तेन तत्क्षणं
निजं वपुः पुनरयन्निजां रुचिम् ॥
अवज्ञया यदहसदुच्चकैर्बलः
समुल्लसद्दशनमयूखमण्डलः ।
रुषारुणीकृतमपि तेन तत्क्षणं
निजं वपुः पुनरयन्निजां रुचिम् ॥
समुल्लसद्दशनमयूखमण्डलः ।
रुषारुणीकृतमपि तेन तत्क्षणं
निजं वपुः पुनरयन्निजां रुचिम् ॥
मल्लिनाथः
अवशयेति ॥ बलो बलभद्रः समुल्लसत्समन्ततः प्रसरद्दशनमयूखमण्डलं दन्तरश्मिपटलं यस्य स सन् अवज्ञयाऽनादरेण उच्चैरहसदिति यत् तेन हासेन रुषारुणीकृतमपि निजं वपुः तत्क्षणं तस्मिन्क्षणे । अत्यन्तसंयोगे द्वितीया । पुनरुचिं धावल्यमेवानयत् । अत्र वपुषः स्वधावल्यत्यागेन दन्तधावल्यस्वीकारात्तद्गुणालंकारः । `तद्गुणः स्वगुणत्यागादन्योत्कृष्टगुणाश्रयात्` इति लक्षणात्
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | व | ज्ञ | या | य | द | ह | स | दु | च्च | कै | र्ब | लः |
| स | मु | ल्ल | स | द्द | श | न | म | यू | ख | म | ण्ड | लः |
| रु | षा | रु | णी | कृ | त | म | पि | ते | न | त | त्क्ष | णं |
| नि | जं | व | पुः | पु | न | र | य | न्नि | जां | रु | चिम् | |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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