अलक्ष्यत क्षणदलिताङ्गदे गदे
करोदरप्रहितनिजांसधामनि ।
समुल्लसच्छकलितपाटलोपलैः
स्फुलिङ्गवान्स्फुटमिव कोपपावकः ॥
अलक्ष्यत क्षणदलिताङ्गदे गदे
करोदरप्रहितनिजांसधामनि ।
समुल्लसच्छकलितपाटलोपलैः
स्फुलिङ्गवान्स्फुटमिव कोपपावकः ॥
करोदरप्रहितनिजांसधामनि ।
समुल्लसच्छकलितपाटलोपलैः
स्फुलिङ्गवान्स्फुटमिव कोपपावकः ॥
मल्लिनाथः
अलक्ष्यतेत्यादि ॥ करोदरप्रहितं पाणितलास्फालितं निजमंसधाम स्वांसप्रदेशो येन तस्मिन् । अत एव क्षणाद्दलिताङ्गदे भग्नकेयूरे गदे गदाख्ये कृष्णानुजे समुल्लसद्भिरुत्पतद्भिः शकलितैः शकलीकृतैर्दलदङ्गदगलितैः पाटलोपलैः पद्मरागैः कोपपावकः स्फुलिङ्गवानिव स्फुटं व्यक्तमलक्ष्यतेत्युत्प्रेक्षा । `त्रिषु स्फुलिङ्गोऽग्निकणः` इत्यमरः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ल | क्ष्य | त | क्ष | ण | द | लि | ता | ङ्ग | दे | ग | दे |
| क | रो | द | र | प्र | हि | त | नि | जां | स | धा | म | नि |
| स | मु | ल्ल | स | च्छ | क | लि | त | पा | ट | लो | प | लैः |
| स्फु | लि | ङ्ग | वा | न्स्फु | ट | मि | व | को | प | पा | व | कः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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