अरातिभिर्युधि सहयुध्वनो हता-
ञ्जिघृक्षवः श्रुतरणतूर्यनिःस्वनाः ।
अकुर्वत प्रथमसमागमोचितं
चिरोज्झितं सुरगणिकाः प्रसाधनम् ॥
अरातिभिर्युधि सहयुध्वनो हता-
ञ्जिघृक्षवः श्रुतरणतूर्यनिःस्वनाः ।
अकुर्वत प्रथमसमागमोचितं
चिरोज्झितं सुरगणिकाः प्रसाधनम् ॥
ञ्जिघृक्षवः श्रुतरणतूर्यनिःस्वनाः ।
अकुर्वत प्रथमसमागमोचितं
चिरोज्झितं सुरगणिकाः प्रसाधनम् ॥
मल्लिनाथः
अरातिभिरिति ॥ सह युध्यन्त इति तान्सहयुध्वनः । `सहे च` (३।२। ९६) इति क्वनिप् । अत एवारातिभिर्युधि हतान् जिघृक्षवो ग्रहीतुमिच्छवः स्वयंवरणकामाः । ग्रहेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । सुरगणिका अप्सरसः श्रुतरणतूर्यनिःस्वनाः सत्यश्चिरोज्झितम् । प्रायेण प्रवीरसंवादाभावादिति भावः । प्रथमसमागमोचितम् । अतिमोहनमित्यर्थः । प्राथम्यं च पुंसामिदं प्रथमत्वादिति भावः । प्रसाध. नमकुर्वत । परिष्कृतवत्य इत्यर्थः । `प्रतिकर्म प्रसाधनम्` इत्यमरः । अत्र स्वयंवरणतूर्यश्रवणयोर्विशेषणगत्या प्रसाधनहेतुत्वात्काव्यलिङ्गम्
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | रा | ति | भि | र्यु | धि | स | ह | यु | ध्व | नो | ह | ता |
| ञ्जि | घृ | क्ष | वः | श्रु | त | र | ण | तू | र्य | निः | स्व | नाः |
| अ | कु | र्व | त | प्र | थ | म | स | मा | ग | मो | चि | तं |
| चि | रो | ज्झि | तं | सु | र | ग | णि | काः | प्र | सा | ध | नम् |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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