गभीरताविजितमृदङ्गनादया
स्वनश्रिया हतरिपुहंसहर्षया ।
प्रमोदयन्नथ मुखरान्कलापिनः
प्रतिष्ठते नवघनवद्रथः स्म सः ॥
गभीरताविजितमृदङ्गनादया
स्वनश्रिया हतरिपुहंसहर्षया ।
प्रमोदयन्नथ मुखरान्कलापिनः
प्रतिष्ठते नवघनवद्रथः स्म सः ॥
स्वनश्रिया हतरिपुहंसहर्षया ।
प्रमोदयन्नथ मुखरान्कलापिनः
प्रतिष्ठते नवघनवद्रथः स्म सः ॥
मल्लिनाथः
गभीरतेति ॥ अथ गरुडागमनानन्तरं स रथो नवघनवत् नवघनेन नवाम्बुदेन तुल्यम् । `तेन तुल्यम्-` (अष्टाध्यायी ५.१.११५ ) इति वतिप्रत्ययः । गभीरतया गाम्भीर्येण विजितो मृदङ्गनादो यया तया हतो रिपुहंसानां हंसानामिव रिपूर्णां हर्षो यया तया स्वनश्रिया ध्वनिसंपदा मुखरान्कूजतः कलापिनो मयूरान्प्रमोदयन् प्रतिष्ठते स प्रतस्थे । `समवप्रविभ्यः स्थः` (१॥३।२२) इत्यात्मनेपदम् । `लट् स्मे` (अष्टाध्यायी ३.२.११८ ) इति भूते लट् । तद्धितगता श्रौती पूर्णोपमा
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | भी | र | ता | वि | जि | त | मृ | द | ङ्ग | ना | द | या |
| स्व | न | श्रि | या | ह | त | रि | पु | हं | स | ह | र्ष | या |
| प्र | मो | द | य | न्न | थ | मु | ख | रा | न्क | ला | पि | नः |
| प्र | ति | ष्ठ | ते | न | व | घ | न | व | द्र | थः | स्म | सः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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