मनोहरैः प्रकृतिमनोरमाकृति-
र्भयप्रदैः समितिषु भीमदर्शनः ।
सदैवतैः सततमथानपायिभि-
र्निजाङ्गवन्मुरजिदसेव्यतायुधैः ॥
मनोहरैः प्रकृतिमनोरमाकृति-
र्भयप्रदैः समितिषु भीमदर्शनः ।
सदैवतैः सततमथानपायिभि-
र्निजाङ्गवन्मुरजिदसेव्यतायुधैः ॥
र्भयप्रदैः समितिषु भीमदर्शनः ।
सदैवतैः सततमथानपायिभि-
र्निजाङ्गवन्मुरजिदसेव्यतायुधैः ॥
मल्लिनाथः
मनोहरैरिति ॥ अथ प्रकृतिमनोरमाकृतिः स्वभावसुन्दरमूर्तिः समितिषु युद्धेषु भीमं दर्शनं यस्य स भीमदर्शनो मुरजिद्धरिः मनोहरैः प्रकृतिमनोहरैः समितिषु भयप्रदैः सदैवतैः अधिदेवतायुक्तैः सततमनपायिभिरायुधैः शार्ङ्गादिभिर्निजाङ्गवत्पृथगवस्थितैः शरीरैरिवेत्युप्रेक्षा । असेव्यत सेवितः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | नो | ह | रैः | प्र | कृ | ति | म | नो | र | मा | कृ | ति |
| र्भ | य | प्र | दैः | स | मि | ति | षु | भी | म | द | र्श | नः |
| स | दै | व | तैः | स | त | त | म | था | न | पा | यि | भि |
| र्नि | जा | ङ्ग | व | न्मु | र | जि | द | से | व्य | ता | यु | धैः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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