ससंभ्रमं चरणतलाभिताडन-
स्फुटन्महीविवरवितीर्णवर्त्मभिः ।
रवेः करैरनुचिततापितोरगं
प्रकाशतां शिनिरनयद्रसातलम् ॥
ससंभ्रमं चरणतलाभिताडन-
स्फुटन्महीविवरवितीर्णवर्त्मभिः ।
रवेः करैरनुचिततापितोरगं
प्रकाशतां शिनिरनयद्रसातलम् ॥
स्फुटन्महीविवरवितीर्णवर्त्मभिः ।
रवेः करैरनुचिततापितोरगं
प्रकाशतां शिनिरनयद्रसातलम् ॥
मल्लिनाथः
ससंभ्रममिति ॥ शिनिः सात्यकेः पितामहः ससंभ्रमं ससत्वरं चरणतलाभिताडनेन पादतलाभिघातेन स्फुटन्त्या दलन्त्या मह्या विवरैश्छिद्रैर्वितीर्णवर्त्मभिर्दत्तमार्गः । तत्प्रसरणैरित्यर्थः । रवेः करैरनुचितं पूर्वमपरिचितमिदं यथा तथा तापिताः संतापं गमिता उरगा यस्मिंस्तत् रसातलं प्रकाशतां प्रकटत्वमनयत् । अत्र महीरविकरोरगरसातलानां क्रमेण स्फुटनान्तःप्रवेशतापप्रकाशनैरसंबन्धेऽपि संबन्धोक्तेरतिशयोक्तिः । पादाहननैरमानुषीं तीव्रतां व्रजति स्मेति ध्वनिः
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | सं | भ्र | मं | च | र | ण | त | ला | भि | ता | ड | न |
| स्फु | ट | न्म | ही | वि | व | र | वि | ती | र्ण | व | र्त्म | भिः |
| र | वेः | क | रै | र | नु | चि | त | ता | पि | तो | र | गं |
| प्र | का | श | तां | शि | नि | र | न | य | द्र | सा | त | लम् |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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