इतीरिते वचसि वचस्विनामुना
युगक्षयक्षुभितमरुद्गरीयसि ।
प्रचक्षुभे सपदि तदम्बुराशिना
समं महाप्रलयसमुद्यतं सदः ॥
इतीरिते वचसि वचस्विनामुना
युगक्षयक्षुभितमरुद्गरीयसि ।
प्रचक्षुभे सपदि तदम्बुराशिना
समं महाप्रलयसमुद्यतं सदः ॥
युगक्षयक्षुभितमरुद्गरीयसि ।
प्रचक्षुभे सपदि तदम्बुराशिना
समं महाप्रलयसमुद्यतं सदः ॥
मल्लिनाथः
इतीति ॥ इतीत्थममुना वचस्त्रिना वाग्मिना । `मनस्विना` इति पाठे मनस्विना धीरेण दूतेन युगक्षये कल्पान्ते क्षुभित उद्धतो मरुत्तद्वद्गरीयसि वचसि ईरिते सति । तदम्बुराशिना युगक्षयवर्धिना समं तुल्यं यथा तथा सदो हरेरास्थानं महाप्रलये सर्वसंहारे समुद्यतमुद्युक्तं सत् सपदि प्रचुक्षुभे प्रचुकोप । कल्पोद्धतमहामारुतेन महार्णव इव तद्वचनेन तत्सदः क्षुभितमासीदित्यर्थः । उपमा । रुचिरा वृत्तम् । `चतुर्ग्रहैरिह रुचिरा जभस्जगा` इति लक्षणात्
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ती | रि | ते | व | च | सि | व | च | स्वि | ना | मु | ना |
| यु | ग | क्ष | य | क्षु | भि | त | म | रु | द्ग | री | य | सि |
| प्र | च | क्षु | भे | स | प | दि | त | द | म्बु | रा | शि | ना |
| स | मं | म | हा | प्र | ल | य | स | मु | द्य | तं | स | दः |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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