मल्लिनाथः
क्रियत इति ॥ धवलो निर्मलो धवलैर्निर्मलैरेवोच्चकैरुन्नतः क्रियते खलु । सितेतरैमलिनैरधः क्रियते। तथा हि—शंकरः शिवः सुरसिन्धोरोघं मन्दाकिनीपूरं शिरसा अधत्त । उभयोर्नैर्मल्यादिति भावः । मधुजिन्मधुशत्रुर्विष्णुस्तु तमोगमङ्घ्रिणा अधत्त । स्वयं मलिनत्वादिति भावः । अतो विशेषविदुषां राजा पूज्य एवेति भावः । विशेषेण सामान्यसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
गीतिः
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्रि | य | ते | ध | व | लः | ख | लू | च्च | |||
| कै | र्ध | व | लै | रे | व | सि | ते | त | रै | र | धः |
| शि | र | सौ | ध | म | ध | त्त | श्ङ्क | ||||
| रः | सु | र | सि | न्धो | र्म | धु | जि | त्त | म | ङ्घ्रि | णा |
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