मल्लिनाथः
उपकारेति ॥ किंच सज्जनः स्वभावतः सततं सर्वजनस्योपकारपरः । नतूपाधिपरः कदाचित्कस्यचिदेवेति भावः । तथापि सर्वोपकारित्वेऽपि तदुन्नतिस्तस्य सज्जनस्योत्कर्षः असतामसाधूनामनिशं गुरुहृद्रोगकरी अत्यन्तहृदयसंतापकारिणी । `कृञो हेतु-` (अष्टाध्यायी ३.२.२० ) इत्यादिना ताच्छील्ये टप्रत्यये `टिड्ढाणञ्-` (४।०१५) इत्यादिना ङीप् । हरिचैद्यौ चैवंभूताविति सैवाप्रस्तुतप्रशंसा
छन्दः
वियोगिनी []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | प | का | र | प | रः | स्व | भा | व | तः | |
| स | त | तं | स | र्व | ज | न | स्य | स | ज्ज | नः |
| अ | स | ता | म | नि | शं | त | था | प्य | हो | |
| गु | रु | हृ | द्रो | ग | क | री | त | दु | न्न | तिः |
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