मल्लिनाथः
समरेति ॥ नृपगणे समरोन्मुखेऽपि तस्य नृपगणस्यानुमरणे सहमरणे उद्यतोधुक्ता अत एवैका मुख्या धीर्यस्य सः । दीनेनाप्यशोच्येन परिजनेन कृताश्रुजलो मुक्तबाप्पः । दासीमुक्ताश्रुबिन्दुरित्यर्थः । तथापि स्वयं स्थिरमना अचलितचित्तो&#३२; भटीजनो भटस्त्रीलोकः । जातावेकवचनम् । `पुंयोगादाख्यायाम्` (४। १ । ४८) इति डीप् । न विचक्लमे न तत्रास । सहमृत्युप्रियाणां कुतः संत्रास इति भावः । अत्र मरणोद्योगस्य विशेषणगत्या अक्लैब्यहेतुत्वात्काव्यलिङ्गभेदः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | म | रो | न्मु | खे | नृ | प | ग | णे | ऽपि | |||
| त | द | नु | म | र | णो | द्य | तै | क | धीः | |||
| दी | न | प | रि | ज | न | कृ | ता | श्रु | ज | लो | ||
| न | भ | टी | ज | नः | स्थि | र | म | नाः | वि | च | क्ल | मे |
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