मल्लिनाथः
सहेति ॥ सुतनोः शुभाङ्गयाः गण्डफलकमभितः । गण्डस्थलयोरित्यर्थः । `अभितःपरित:-` (वा०) इत्यादिना द्वितीया । नयनकमलाम्बुसंततिरश्रुधारा कज्जलेनाञ्जनेन सह शोक एव शोकमयस्तस्य कृष्णवर्त्मनः शोकाग्नेः पदवी निःसरणमार्ग इव विरराज शुशुभे । येन वर्त्मना अग्निर्गच्छति तत्कृष्णं भवतीति कृष्णवर्त्मा । अत्राप्यश्रुपात एव दुर्निमित्तमिति भावः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | ह | क | ज्ज | ले | न | वि | र | रा | ज | |||
| न | य | न | क | म | ला | म्बु | स | न्त | तिः | |||
| ग | ण्ड | फ | ल | क | म | भि | तः | सु | त | नोः | ||
| प | द | वी | व | शो | क | म | य | कृ | ष्ण | व | र्त्म | नः |
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