मल्लिनाथः
परित इति ॥ किं चेति चार्थः । धौतेषु शोधितेषु मुखरुक्मेषु मुखस्य रुक्माभरणेषु विलसत्प्रत्येकं प्रतिफलदहिमांशुमण्डलमर्कबिम्बं येषां ते तथोक्ताः । अतएव स्फुटलक्ष्यमन्तर्गत्वा बहिः स्फुरितं तेजोऽन्तःसारो येषां ते इव स्थिता इत्युत्प्रेक्षा । तेजो व्याख्यातं पञ्चमे तेजोनिरोधेत्यत्र । अतनुवपुषो महाकायाः श्रिय आत्मजा अश्वाः । `लक्ष्मीपुत्रोऽश्व आढये च` इति वैजयन्ती । परितः पृथिवीं तेनुर्व्याप्तवन्तः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | रि | त | श्च | धौ | त | मु | ख | रु | क्म | |||
| वि | ल | स | द | हि | मां | शु | म | ण्ड | लाः | |||
| ते | नु | र | त | नु | व | पु | षः | पृ | थि | वीं | ||
| स्फु | ट | ल | क्ष्य | ते | ज | स | इ | वा | त्म | जाः | श्रि | यः |
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