मल्लिनाथः
स्फुरमाणेति ॥ स्फुरमाणानि नेत्राण्येव कुसुमान्योष्ठा एव दलानि च यस्मिकर्मणि तद्यथा तथा धूताः कम्पिताः पृथवो भुजा एव लताः शाखा यस्मि`निपित्सता`. [* अत्र छन्दोमङ्गः सुधीभिर्विमर्शनीयाः.]&#३२; न्कर्मणि तद्यथा तथा । चलितैः भूभृतो राजानस्त एव अङ्घ्रिपाः पादपास्तैः सदः सभामण्डलं दुतः शीघ्रो वातपातो वायुप्रचारो यस्य तस्य वनस्य विभ्रमं शोभाम् । “विभ्रमः संशये भ्रान्तौ शोभायां च` इति वैजयन्ती । अमृत बभार । भृञो लुङि तङ् `उश्च` (अष्टाध्यायी १.२.१२ ) इति सिचः कित्त्वाद्गुणाभावः `ह्रस्वादङ्गात्` (अष्टाध्यायी ८.२.२७ ) इति सलोपः । अत्र वनविभ्रममिति सादृश्याक्षेपादसंभवद्वस्तुसंबन्धा निदर्शना नेत्रकुसुमेत्यादिरूपकोत्थापितेति संकरः
छन्दः
उद्गता []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्फु | र | मा | ण | ने | त्र | कु | सु | मो | ष्ठ | |||
| द | ल | म | भृ | त | भू | भृ | द | ङ्घ्रि | पैः | |||
| धू | त | पृ | थु | भु | ज | ल | तं | च | लि | तै | ||
| र्द्रु | त | वा | त | पा | त | व | न | वि | भ्र | मं | स | दः |
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