गच्छतापि गगनाग्रमुच्चकै-
र्यस्य भूधरगरीयसाङ्घ्रिणा ।
क्रान्तकन्धर इवाबलो बलिः
स्वर्गभर्तुरगमत्सुबन्धताम् ॥
गच्छतापि गगनाग्रमुच्चकै-
र्यस्य भूधरगरीयसाङ्घ्रिणा ।
क्रान्तकन्धर इवाबलो बलिः
स्वर्गभर्तुरगमत्सुबन्धताम् ॥
र्यस्य भूधरगरीयसाङ्घ्रिणा ।
क्रान्तकन्धर इवाबलो बलिः
स्वर्गभर्तुरगमत्सुबन्धताम् ॥
मल्लिनाथः
गच्छतेति ॥ गगनाग्रं गगनोपरिभागं गच्छतापीति विरोधः । भूधरगरीयसेत्युपमा । यस्य वामनस्योच्चकैरुन्नतेनाङ्घ्रिणा क्रान्तकंधरोऽवष्टब्धकण्ठ इवाबलो दुर्बलो बलिर्वैरोचनिः स्वर्गभर्तुरिन्द्रस्य सुखेन बध्यत इति सुबन्धः । `ईषदुःसुषु-` (अष्टाध्यायी ३.३.१२६ ) इत्यादिना खल्प्रत्ययः । तत्तामगमत् । गुरुद्रव्यावष्टब्धकण्ठो हि सुखेन बध्यत इति भावः । `न लोका-` (अष्टाध्यायी २.३.६९ ) इत्यादिना कृद्योगलक्षणाया एव षष्ट्या निषेधात्स्वर्गभर्तुरिति शेषे षष्ठी । अत्र क्रान्तकंधर इवेत्युत्प्रेक्षाया भूधरगरीयसेत्युपमासापेक्षत्वात्संकरः । विरोधेन त्वनपेक्षिता संसृष्टिः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ग | च्छ | ता | पि | ग | ग | ना | ग्र | मु | च्च | कै |
| र्य | स्य | भू | ध | र | ग | री | य | सा | ङ्घ्रि | णा |
| क्रा | न्त | क | न्ध | र | इ | वा | ब | लो | ब | लिः |
| स्व | र्ग | भ | र्तु | र | ग | म | त्सु | ब | न्ध | ताम् |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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