मल्लिनाथः
किमिति ॥ एष वामनः खर्वः । `खर्वो हस्त्रश्च वामनः` इत्यमरः । किं क्रमिष्यति इत्थमनेन प्रकारेण दानवा यावन्नाहसन् तावत्ततः प्रागेव लवितेऽतिक्रान्ते अर्कशशिमण्डले येन सोऽस्य हरेः क्रमः पादविक्षेपो नभस्तले न ममौ न परिमाणं गतवान् । यथा न माति तथा ववृधे इत्यर्थः । अत्राधारान्नभस्तलादाधेयस्य क्रमस्याधिक्यकथनादधिकालंकारभेदः । आश्रयाश्रयिणोराधिक्यमधिकमिति लक्षणात्
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| किं | क्र | मि | ष्य | ति | कि | लै | ष | वा | म | नो |
| या | व | दि | त्थ | म | ह | स | न्न | दा | न | वाः |
| ता | व | द | स्य | न | म | मौ | न | भ | स्त | ले |
| ल | ङ्घि | ता | र्क | श | शि | म | ण्ड | लः | क्र | मः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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