पद्मभूरिति सृजञ्जगद्रजः
सत्वमच्युत इति स्थितिं नयन् ।
संहरन्हर इति श्रितस्तम-
स्रैधमेष भजति त्रिभिर्गुणैः ॥
पद्मभूरिति सृजञ्जगद्रजः
सत्वमच्युत इति स्थितिं नयन् ।
संहरन्हर इति श्रितस्तम-
स्रैधमेष भजति त्रिभिर्गुणैः ॥
सत्वमच्युत इति स्थितिं नयन् ।
संहरन्हर इति श्रितस्तम-
स्रैधमेष भजति त्रिभिर्गुणैः ॥
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | द्म | भू | रि | ति | सृ | ज | ञ्ज | ग | द्र | जः |
| स | त्व | म | च्यु | त | इ | ति | स्थि | तिं | न | यन् |
| सं | ह | र | न्ह | र | इ | ति | श्रि | त | स्त | म |
| स्रै | ध | मे | ष | भ | ज | ति | त्रि | भि | र्गु | णैः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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