तत्र मन्त्रपवितं हविः क्रता-
वश्नतो न वपुरेव केवलम् ।
वर्णसम्पदमतिस्फुटां दध-
न्नाम चोज्ज्वलमभूद्धविर्भुजः ॥
तत्र मन्त्रपवितं हविः क्रता-
वश्नतो न वपुरेव केवलम् ।
वर्णसम्पदमतिस्फुटां दध-
न्नाम चोज्ज्वलमभूद्धविर्भुजः ॥
वश्नतो न वपुरेव केवलम् ।
वर्णसम्पदमतिस्फुटां दध-
न्नाम चोज्ज्वलमभूद्धविर्भुजः ॥
मल्लिनाथः
तत्रेति ॥ तत्र क्रतौ । मन्त्रेरुत्पवनादिमन्त्रैः पवितं पवित्रितम् । शोधितमित्यर्थः । `पूङ्श्च` (अष्टाध्यायी ७.२.५१ ) इति विकल्पादिडागमः । हविराज्यादिकमश्नतो भुञ्जानस्य । अशेर्भोजनार्थाल्लटः शत्रादेशः । हवींषि भुङ्क्त इति हविर्भुजोऽग्नेः संबन्धि। अतिस्फुटामतिविकसितां वर्णसंपदं रूपसमृद्धिं दधत् केवलमेकम् । `केवलं त्वेककृत्स्नयोः` इति शाश्वतः । वपुरेवोज्वलमोजिष्ठं नाभूत् । किंतु अतिस्फुटामतिव्यक्तार्थां वर्णसंपदमक्षरसमुदायं दधत् । `वर्णो द्विजादौ शुक्लादौ स्तुतौ वर्णं तु चाक्षरे` इत्यमरः । नाम हविर्भुगिति नामधेयं चोज्वलं रूढमभूत् । निरन्तरं हविर्भोजनाद्वपुः पुष्टिमाप, नाम चार्थवदासीदित्यर्थः । अत्र भोजनस्याश्नत इति विशेषणगत्या हेतुत्वात्पदार्थहेतुकं काव्यलिङ्गम्
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | त्र | म | न्त्र | प | वि | तं | ह | विः | क्र | ता |
| व | श्न | तो | न | व | पु | रे | व | के | व | लम् |
| व | र्ण | स | म्प | द | म | ति | स्फु | टां | द | ध |
| न्ना | म | चो | ज्ज्व | ल | म | भू | द्ध | वि | र्भु | जः |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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