इत्युदीरितगिरं नृपस्त्वयि
श्रेयसि स्थितवति स्थिरा मम ।
सर्वसम्पदिति शौरिमुक्तवा-
नुद्वहन्मुदमुदस्थित क्रतौ ॥
इत्युदीरितगिरं नृपस्त्वयि
श्रेयसि स्थितवति स्थिरा मम ।
सर्वसम्पदिति शौरिमुक्तवा-
नुद्वहन्मुदमुदस्थित क्रतौ ॥
श्रेयसि स्थितवति स्थिरा मम ।
सर्वसम्पदिति शौरिमुक्तवा-
नुद्वहन्मुदमुदस्थित क्रतौ ॥
मल्लिनाथः
इतीति ॥ इतीत्थमुदीरितगिरमुपन्यस्तवाचं शौरिं हरिं नृपो युधिष्ठिरः त्वयि श्रेयस्यभ्युदये विषये स्थितवति सति । त्वयि क्षेमंकरे सतीत्यर्थः । मम सर्वसंपत् स्थिरेत्युक्तवान् । मुदमुद्वहन् सहायसंपत्त्या संतुष्यन् सन् । क्रतावुदस्थित । क्रतुं कर्तुमुद्युक्तवानित्यर्थः । तिष्ठतेर्लुङि `उदोऽनूर्ध्वकर्मणि` (॥३।२४) इत्यादिनात्मनेपदं `स्थाध्वोरिच` (अष्टाध्यायी १.२.१७ ) इति सिचः कित्वादिकारः । `हस्वादङ्गात्` (अष्टाध्यायी ८.२.२७ ) इति सकारलोपः
छन्दः
रथोद्धता [११: रनरलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | त्यु | दी | रि | त | गि | रं | नृ | प | स्त्व | यि |
| श्रे | य | सि | स्थि | त | व | ति | स्थि | रा | म | म |
| स | र्व | स | म्प | दि | ति | शौ | रि | मु | क्त | वा |
| नु | द्व | ह | न्मु | द | मु | द | स्थि | त | क्र | तौ |
| र | न | र | ल | ग | ||||||
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