मुकुटांशुरञ्जितपरागमग्रतः
स न यावदाप शिरसा महीतलम् ।
क्षितिपेन तावदनपेक्षितक्रमं
भुजपञ्जरेण रभसादगृह्यत ॥
मुकुटांशुरञ्जितपरागमग्रतः
स न यावदाप शिरसा महीतलम् ।
क्षितिपेन तावदनपेक्षितक्रमं
भुजपञ्जरेण रभसादगृह्यत ॥
स न यावदाप शिरसा महीतलम् ।
क्षितिपेन तावदनपेक्षितक्रमं
भुजपञ्जरेण रभसादगृह्यत ॥
मल्लिनाथः
मुकुटेति ॥ स हरिः मुकुटांशुभी रञ्जितः स्ववर्णमापादितः परागो रेणुर्यस्य तदग्रतः पुरतो महीतलं शिरसा यावन्नाप । नास्पृशदित्यर्थः । तावत्क्षितिपेन धर्मराजेनानपेक्षितक्रमं अनपेक्षितः क्रमः परिपाटी यस्मिन्कर्मणि तत्तथा । भुजाभ्यामेव पञ्जरेणेति रूपकम् । रभसाद्वेगादगृह्यत गृहीतः । प्रणामक्रियासमाप्तेः प्रागेवोत्थाप्याश्लिषदित्यर्थः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| मु | कु | टां | शु | र | ञ्जि | त | प | रा | ग | म | ग्र | तः |
| स | न | या | व | दा | प | शि | र | सा | म | ही | त | लम् |
| क्षि | ति | पे | न | ता | व | द | न | पे | क्षि | त | क्र | मं |
| भु | ज | प | ञ्ज | रे | ण | र | भ | सा | द | गृ | ह्य | त |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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