तृणवाञ्छया मुहुरवाञ्चितानना-
न्निचयेषु यत्र हरिताश्मवेश्मनाम् ।
रसनाग्रलग्नकिरणाङ्कुराञ्जनो
हरिणान्गृहीतकवलानिवैक्षत ॥
तृणवाञ्छया मुहुरवाञ्चितानना-
न्निचयेषु यत्र हरिताश्मवेश्मनाम् ।
रसनाग्रलग्नकिरणाङ्कुराञ्जनो
हरिणान्गृहीतकवलानिवैक्षत ॥
न्निचयेषु यत्र हरिताश्मवेश्मनाम् ।
रसनाग्रलग्नकिरणाङ्कुराञ्जनो
हरिणान्गृहीतकवलानिवैक्षत ॥
मल्लिनाथः
तृणेति ॥ यत्र सभायां हरिताश्मनां मरकतमणीनां गृहाणाम् । `गारुत्मतं मरकतमश्मगर्भो हरिन्मणिः` इत्यमरः । निचयेषु सङ्घेषु तृणवाञ्छया तृणाशया मुहुरवाञ्चिताननान्नमितमुखान् अत एव रसनाग्रेषु लग्नाः किरणा अङ्कुरा इव येषां ते तान् । अत एव गृहीतकवलानुपात्ततृणग्रासानिव स्थितान् हरिणान् जन ऐक्षत ईक्षितवान् । ईक्षतेर्लङि `आडजादीनाम्` (६|४|७२) इत्याट् `आटश्च` (६।१|९०) इति वृद्धिः । अत्र तृणवाञ्छयेति हरिणानां मरकतेषु तृणभ्रान्तेर्भ्रान्तिमदलंकारः । तन्मूला चेयं गृहीतकवलत्वोत्प्रेक्षेति संकरः
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तृ | ण | वा | ञ्छ | या | मु | हु | र | वा | ञ्चि | ता | न | ना |
| न्नि | च | ये | षु | य | त्र | ह | रि | ता | श्म | वे | श्म | नाम् |
| र | स | ना | ग्र | ल | ग्न | कि | र | णा | ङ्कु | रा | ञ्ज | नो |
| ह | रि | णा | न्गृ | ही | त | क | व | ला | नि | वै | क्ष | त |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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