अधिरुह्यतामिति महीभृतोदितः
कपिकेतुनार्पितकरो रथं हरिः ।
अवलम्बितैलविलपाणिपल्लवः
श्रयति स्म मेघमिव मेघवाहनः ॥
अधिरुह्यतामिति महीभृतोदितः
कपिकेतुनार्पितकरो रथं हरिः ।
अवलम्बितैलविलपाणिपल्लवः
श्रयति स्म मेघमिव मेघवाहनः ॥
कपिकेतुनार्पितकरो रथं हरिः ।
अवलम्बितैलविलपाणिपल्लवः
श्रयति स्म मेघमिव मेघवाहनः ॥
मल्लिनाथः
अधीति ॥ अथ हरिरधिरुह्यतां रथ आरुह्यतामित्येवं महीभृता धर्मराजेनोदित उक्तः सन् । वदेः कर्मणि क्तः । `वचिस्वपि-` (अष्टाध्यायी ६.१.१५ ) इत्यादिना संप्रसारणम् । कपिकेतुनार्जुनेनार्पितकरो दत्तहस्तः सन् । अवलम्बितोऽवष्टब्ध ऐलविलस्य कुबेरस्य पाणिपल्लवो हस्तो येन स मेघवाहन इन्द्रो मेघमिव रथं श्रयति स्म आरूढवानित्यर्थः । उपमा
छन्दः
मञ्जुभाषिणी [१३: सजसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | धि | रु | ह्य | ता | मि | ति | म | ही | भृ | तो | दि | तः |
| क | पि | के | तु | ना | र्पि | त | क | रो | र | थं | ह | रिः |
| अ | व | ल | म्बि | तै | ल | वि | ल | पा | णि | प | ल्ल | वः |
| श्र | य | ति | स्म | मे | घ | मि | व | मे | घ | वा | ह | नः |
| स | ज | स | ज | ग | ||||||||
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