अव्याहतक्षिप्रगतैः समुच्छ्रि-
ताननुज्झितद्रामबिर्गरीयसः ।
नाव्यं पयःकेचिदतारिषुर्भु-
जैः क्षिपद्भिरूर्मीनपरैरिवोर्मिभिः ॥
अव्याहतक्षिप्रगतैः समुच्छ्रि-
ताननुज्झितद्रामबिर्गरीयसः ।
नाव्यं पयःकेचिदतारिषुर्भु-
जैः क्षिपद्भिरूर्मीनपरैरिवोर्मिभिः ॥
ताननुज्झितद्रामबिर्गरीयसः ।
नाव्यं पयःकेचिदतारिषुर्भु-
जैः क्षिपद्भिरूर्मीनपरैरिवोर्मिभिः ॥
मल्लिनाथः
अव्याहतेति ॥ अत्रोर्मीणां भुजानां विशेषणान्युभयविपरिणामेन योज्यानि । केचिज्जनाः नावा तार्यं नाव्यम् । `नाव्यं त्रिलिङ्गं नौतार्ये` इत्यमरः । `नौवयोधर्म-` (अष्टाध्यायी ४.९.९१ ) इत्यादिना यत्प्रत्ययः । पयो जलं अव्याहतक्षिप्रगतैरप्रतिहतशीघ्रगमनैरनुज्झितो द्राघिमा दैर्घ्यं यस्तैः । अतिदीर्घैरित्यर्थः । समुच्छ्रितानुन्नतान् गरीयसो गुरुतरानूर्मीन्क्षिपद्भिरपाकुर्वद्भिरत एवापरैरूर्मिभिरिव स्थितैरित्युत्प्रेक्षा । भुजैर्बाहुभिरतारिषुस्तरन्ति स्म । तरेर्लुङि सिचि वृद्धिरिडागमश्च
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | व्या | ह | त | क्षि | प्र | ग | तैः | स | मु | च्छ्रि | ||
| ता | न | नु | ज्झि | त | द्रा | म | बि | र्ग | री | य | सः | |
| ना | व्यं | प | यः | के | चि | द | ता | रि | षु | र्भु | ||
| जैः | क्षि | प | द्भि | रू | र्मी | न | प | रै | रि | वो | र्मि | भिः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||||
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