नानाविधाविष्कृसामजस्वरः
सहस्रवर्त्मा चपलैर्दुरध्ययः ।
गान्धर्वभूय्ष्ठतया समानतां
स सामवेदस्य दधौ बलोदधिः ॥
नानाविधाविष्कृसामजस्वरः
सहस्रवर्त्मा चपलैर्दुरध्ययः ।
गान्धर्वभूय्ष्ठतया समानतां
स सामवेदस्य दधौ बलोदधिः ॥
सहस्रवर्त्मा चपलैर्दुरध्ययः ।
गान्धर्वभूय्ष्ठतया समानतां
स सामवेदस्य दधौ बलोदधिः ॥
मल्लिनाथः
नानेति ॥ सामजा गजाः । `सामजौ गजसामोत्थौ` इति शाश्वतः । नानाविधमाविष्कृताः सामजानां स्वरा ध्वनयो बृंहितानि यस्मिन् स सहस्रवर्त्मा बहुभिर्मार्गैर्गच्छन् । गन्धर्वा एव गान्धर्वा अश्वाः । `वाजिवाहार्वगन्धर्व-` इत्यमरः । तैर्भूयिष्ठतया चपलैरस्थिरैः दुरध्ययो दुष्प्रापः । `इण् गतौ` इत्यस्मात्कृच्छ्रार्थे खल् । ईदृशः स बलोदधिः सेनासमुद्रः सामवेदस्य समानतां दधौ । तत्समोऽभूदित्यर्थः । सामवेदोऽपि बहुधाविष्कृतबृहद्रथन्तरादिसामोत्थितस्वरः । सहस्रशाखत्वात्सहस्रवर्त्मा । गान्धर्वगानबहुत्वाच्चपलमतिभिरध्येतुमशक्य इत्यर्थः। `इङ् अध्ययने` इत्यस्माद्धातोः खलि दुरध्यय इत्येवं रूपम्
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ना | ना | वि | धा | वि | ष्कृ | सा | म | ज | स्व | रः | |
| स | ह | स्र | व | र्त्मा | च | प | लै | र्दु | र | ध्य | यः |
| गा | न्ध | र्व | भू | य्ष्ठ | त | या | स | मा | न | तां | |
| स | सा | म | वे | द | स्य | द | धौ | ब | लो | द | धिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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