अदयमिव कराग्रैरेष निपीड्य सद्यः
शशधरमहरादौ रागवानुष्णरश्मिः ।
अवकिरति नितान्तं कान्तिनिर्यासमब्द-
स्रुतनवजलपाण्डुं पुण्डरीकोदरेषु ॥
अदयमिव कराग्रैरेष निपीड्य सद्यः
शशधरमहरादौ रागवानुष्णरश्मिः ।
अवकिरति नितान्तं कान्तिनिर्यासमब्द-
स्रुतनवजलपाण्डुं पुण्डरीकोदरेषु ॥
शशधरमहरादौ रागवानुष्णरश्मिः ।
अवकिरति नितान्तं कान्तिनिर्यासमब्द-
स्रुतनवजलपाण्डुं पुण्डरीकोदरेषु ॥
मल्लिनाथः
अदयमिति ॥ अहरादौ प्रभाते रागवानुदयरागवान् पुण्डरीकस्नेहवांश्चैष उष्णरश्मिरर्कः शशधर चन्द्रं कराग्रैः रश्म्यग्रैः हस्ताग्रैश्चादयं निर्दयं सद्यो निष्पीड्य अब्दान्मेघात्स्रुतं स्रस्तं नवजलमिव पाण्डुं शुभ्रं कान्तिनिर्यासं लावण्यसारं पुण्डरीकाणां सिताब्जानामुदरेष्वभ्यन्तरेषु नितान्तमवकिरतीव विक्षिपतीव । अत्र सूर्योदये चन्द्रस्य कान्तिक्षयात् पुण्डरीकाणां तत्प्रादुर्भावाच्च सूर्यश्चान्द्रीमेव कान्तिं पुण्डरीकस्नेहात्परेषु सिञ्चतीवेत्युत्प्रेक्षा । यथा द्विषन्तं प्रपीड्य तदीयं वसुसारं सुहदे प्रयच्छति तद्वदिति भावः
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | द | य | मि | व | क | रा | ग्रै | रे | ष | नि | पी | ड्य | स | द्यः |
| श | श | ध | र | म | ह | रा | दौ | रा | ग | वा | नु | ष्ण | र | श्मिः |
| अ | व | कि | र | ति | नि | ता | न्तं | का | न्ति | नि | र्या | स | म | ब्द |
| स्रु | त | न | व | ज | ल | पा | ण्डुं | पु | ण्ड | री | को | द | रे | षु |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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