मल्लिनाथः
उद्धतैरिति ॥ निभृतमनुद्धतम् । सूक्ष्ममित्यर्थः । एकमेकाकि छेदवद्विच्छेदयुक्तम् । मृगदृशां मणितं रतिकूजितं उद्धतैः स्थूलैरनेकैर्बहुभिरविरामैरविच्छेदैः कलैरव्यक्तमधुरैः काञ्चीनां नूपुराणां च धनिभिरक्षतमतिरस्कृतमेव श्रूयते स्म श्रुतम् । मणितस्य तिरोधायकशब्दान्तरसद्भावेऽपि ताद्रूप्यानापत्तेरतद्गुणालंकारः । `सति हेतावतद्रूपस्वीकारः स्यादतद्गुणः` इति लक्षणात्
छन्दः
आर्यागीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
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| उ | द्ध | तै | र्नि | भृ | त | मे | क | ||||||
| म | ने | कै | श्छ | द | व | न्मृ | ग | दृ | शा | म | वि | रा | मैः |
| श्रू | य | ते | स्म | म | णि | तं | क | ल | |||||
| का | ञ्ची | नू | पु | र | ध्व | नि | भि | र | क्ष | त | मे | व |
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