अम्बरं विनयतः प्रिय-
पाणेर्योषितस्य करयोः कलहस्य ।
वारणमिव विधातुम-
भीक्ष्णं कक्ष्यया च वलयैश्च शिशिञ्चे ॥
अम्बरं विनयतः प्रिय-
पाणेर्योषितस्य करयोः कलहस्य ।
वारणमिव विधातुम-
भीक्ष्णं कक्ष्यया च वलयैश्च शिशिञ्चे ॥
पाणेर्योषितस्य करयोः कलहस्य ।
वारणमिव विधातुम-
भीक्ष्णं कक्ष्यया च वलयैश्च शिशिञ्चे ॥
छन्दः
आर्यागीतिः []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | म्ब | रं | वि | न | य | तः | प्रि | य | ||||
| पा | णे | र्यो | षि | त | स्य | क | र | योः | क | ल | ह | स्य |
| वा | र | ण | मि | व | वि | धा | तु | म | ||||
| भी | क्ष्णं | क | क्ष्य | या | च | व | ल | यै | श्च | शि | शि | ञ्चे |
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