मल्लिनाथः
संकथेति ॥ नतभ्रूः स्त्री संकथायां संभाषणे इच्छुरिच्छावत्यपि । `विन्दुरिच्छुः` (अष्टाध्यायी ३.२.१६९ ) इत्युप्रत्ययान्तो निपातः । अभिधातुं संभाषयितुमनीशा अक्षमा बभूव । अप्यर्थश्चशब्दः । दिदृक्षुर्द्रष्टुमिच्छुरपि । दृशेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । संमुखी अभिमुखी न बभूव । अङ्गसङ्गचपला गात्रस्पर्शचपलापि दयितस्य स्पर्शनेन चकम्पे कम्पितवती । एते कम्पादयो लज्जासाध्वसानुभावाः । लज्जाविजितमन्मथेयं मुग्धा
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | क | थे | च्छु | र | भि | धा | तु | म | नी | शा |
| सं | मु | खी | न | च | ब | भू | व | दि | दृ | क्षुः |
| स्प | र्श | ने | न | द | यि | त | स्य | न | त | भ्रू |
| र | ङ्ग | च | प | ला | पि | च | क | म्पे | ||
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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