मल्लिनाथः
लीलयेति ॥ लावण्यं कान्तिविशेषोऽस्यास्तीति लावणिकं लावण्यवत् । `अत इनिठनौ` (अष्टाध्यायी ५.२.११५ ) इति ठन्प्रत्यये `ठस्येकः` (अष्टाध्यायी ७.३.५० ) `यस्येति च` (अष्टाध्यायी ६.४.१४८ ) इत्यल्लोपे `हलस्तद्धितस्य` (अष्टाध्यायी ६.४.१५० ) इति यकारलोपः अन्यत्र तु लवणं पण्यमस्यास्तीति लावणिको लवणव्यवहारी । लवणाट्ठञ् प्रत्ययः । तेन लावणिकेन मानवञ्चनविदाऽहंकारहरणदक्षेण, अन्यत्र परिमाणप्रतारणपटुना सुतनोः स्त्रियाः वदनेन का गौरवाढ्यं गाम्भीर्यसंपन्नमपि,अन्यत्र गुरुत्वयुक्तमपि दयितस्य हृदयं लीलया विलासेनैव तुलयित्वा, अन्यत्रानायासेनैवोन्माय । गुर्वपि लघुतया मीत्वेत्यर्थः । क्रीतं वशीकृतमेव अन्यत्र दानेन स्वीकृतमेव । अत्र विशेषणमहिम्नैव वदने लावणिकत्वस्य, हृदये पण्यत्वस्य च प्रतीतेः समासोक्तिरलंकारः । हृदयस्य प्रतीयमानपण्याभेदेन क्रीतत्वोक्तेरलौकिकहृदयावर्जने लौकिकक्रयव्यवहारसमारोपः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ली | ल | यै | व | सु | त | नो | स्तु | ल | यि | त्वा |
| गौ | र | वा | ढ्य | म | पि | ला | व | णि | के | न |
| मा | न | व | ञ्ज | न | वि | दा | व | द | ने | न |
| क्री | त | मे | व | हृ | द | यं | द | यि | त | स्य |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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