मल्लिनाथः
कोपवतीति ॥ प्राक् प्रथमं कोपवती सरोषा अत एवानुनयान् प्रियप्रार्थनानि अगृहीत्वा अनादृत्य । अथो संप्रति विरहखेदितचित्ता पश्चात्तापतप्ता काचिन्मधुमदेनाहितमोहा कृतचित्तविभ्रमा सती कान्तमेव कोपितमात्मना रोषितं कलयन्ती जानती अनुनिन्ये । सापराधाहं क्षमस्वेति प्रार्थितवती । मत्तेषु किं न संभावितमिति भावः । एषा कलहान्तरिता
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| को | प | व | त्य | नु | न | या | न | गृ | ही | त्वा |
| प्रा | ग | थो | म | धु | म | दा | हि | त | मो | हा |
| को | पि | तं | वि | र | ह | खे | दि | त | चि | त्ता |
| का | न्त | मे | व | क | ल | य | न्त्य | नु | नि | न्ये |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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