मल्लिनाथः
पीतेति ॥ पीतशीधूनि पीतमद्यानि अत एव मधुराणि मनोज्ञानि तैमिथुनानां स्त्रीपुंसानामाननैः चषकान्तः पानपात्राभ्यन्तरे । `चषकोऽस्त्री पानपात्रम्` इत्यमरः । परिहृतं त्यक्तं नीलनीरजं वासनार्थे निक्षिप्तं नीलोत्पलं ब्रीडया परिहारलज्जया अलिविरावैः रुददिवाधस्तादगच्छत् । अत्र मद्यापगमनिमित्तस्य नीलनीरजाधोगमनस्य रोदनविशिष्टलज्जाहेतुकत्वोत्प्रेक्षा । सा चालिविरावैरिति व्यधिकरणकारिपरिणामोजीवितेति संकरः
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पी | त | शी | त | धु | म | धु | रै | र्मि | धु | ना | ना |
| मा | न | नैः | प | रि | हृ | तं | च | ष | का | न्तः | |
| व्री | ड | या | रु | द | दि | वा | लि | वि | रा | वै | |
| र्नी | ल | नी | र | ज | म | ग | च्छ | द | ध | स्तात् | |
| र | न | भ | ग | ग | |||||||
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