यतो मेरुः श्रीमान्निपतति युगान्ताग्निवलितः
समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरमकरग्राहनिलयाः ।
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरे का वार्ता करिकलभकर्णाग्रचपले ॥
यतो मेरुः श्रीमान्निपतति युगान्ताग्निवलितः
समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरमकरग्राहनिलयाः ।
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरे का वार्ता करिकलभकर्णाग्रचपले ॥
समुद्राः शुष्यन्ति प्रचुरमकरग्राहनिलयाः ।
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधरपादैरपि धृता
शरीरे का वार्ता करिकलभकर्णाग्रचपले ॥
अन्वयः
AI
यतः युगान्त-अग्नि-वलितः श्रीमान् मेरुः निपतति, प्रचुर-मकर-ग्राह-निलयाः समुद्राः शुष्यन्ति, धरणि-धर-पादैः धृता अपि धरा अन्तम् गच्छति, (ततः) करिकलाभ-कर्ण-अग्र-चपले शरीरे का वार्ता?
Summary
AI
Since even the glorious Mount Meru, enveloped by the fire at the end of an eon, falls down; since the oceans, home to countless crocodiles and sharks, dry up; and since the earth, though supported by mountains, comes to an end; what can be said of this body, as fickle as the tip of a baby elephant's ear?
सारांश
AI
जब मेरु पर्वत गिर जाता है, समुद्र सूख जाते हैं और पृथ्वी का भी अंत निश्चित है, तब हाथी के कान के समान अत्यंत चंचल इस मानव शरीर की क्या बिसात है?
पदच्छेदः
AI
| यतः | यतः | since |
| मेरुः | मेरु (१.१) | Mount Meru |
| श्रीमान् | श्रीमत् (१.१) | glorious |
| निपतति | निपतति (नि√पत् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | falls down |
| युगान्त-अग्नि-वलितः | युगान्त–अग्नि–वलित (१.१) | enveloped by the fire at the end of an eon |
| समुद्राः | समुद्र (१.३) | oceans |
| शुष्यन्ति | शुष्यन्ति (√शुष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | dry up |
| प्रचुर-मकर-ग्राह-निलयाः | प्रचुर–मकर–ग्राह–निलय (१.३) | which are the abode of numerous crocodiles and sharks |
| धरा | धरा (१.१) | the earth |
| गच्छति | गच्छति (√गम् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | goes |
| अन्तम् | अन्त (२.१) | to an end |
| धरणि-धर-पादैः | धरणिधर–पाद (३.३) | by the feet of the mountains |
| अपि | अपि | even |
| धृता | धृत (√धृ+क्त, १.१) | held |
| शरीरे | शरीर (७.१) | about the body |
| का | किम् (१.१) | what |
| वार्ता | वार्ता (१.१) | talk/news |
| करिकलभ-कर्ण-अग्र-चपले | करिकलभ–कर्ण–अग्र–चपल (७.१) | which is as fickle as the tip of a baby elephant's ear |
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | तो | मे | रुः | श्री | मा | न्नि | प | त | ति | यु | गा | न्ता | ग्नि | व | लि | तः |
| स | मु | द्राः | शु | ष्य | न्ति | प्र | चु | र | म | क | र | ग्रा | ह | नि | ल | याः |
| ध | रा | ग | च्छ | त्य | न्तं | ध | र | णि | ध | र | पा | दै | र | पि | धृ | ता |
| श | री | रे | का | वा | र्ता | क | रि | क | ल | भ | क | र्णा | ग्र | च | प | ले |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.