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सार्धं मनोरथशतैस्तव धूर्त कान्ता
सैव स्थिता मनसि कृत्रिमभावरम्या ।
अस्माकमस्ति न कथञ्चिदिहावकाशं
तस्मात्कृतं चरणपातविडम्बनाभिः ॥

अन्वयः AI धूर्त! तव मनोरथ-शतैः सार्धम् सा एव कृत्रिम-भाव-रम्या कान्ता मनसि स्थिता । अस्माकम् इह कथञ्चित् अवकाशम् न अस्ति, तस्मात् चरण-पात-विडम्बनाभिः कृतम् ।
Summary AI O rogue! That very mistress, charming with her artificial feelings, resides in your mind along with hundreds of your desires. There is no room for us here at all; therefore, enough with this mockery of falling at my feet.
सारांश AI हे धूर्त! तुम्हारे मन में तो बनावटी प्रेम वाली वही प्रियतमा बसी है। मेरे लिए वहाँ कोई स्थान नहीं है, इसलिए चरणों में गिरने का यह पाखंड बंद करो।
पदच्छेदः AI
सार्धंसार्धं with
मनोरथ-शतैःमनोरथशत (३.३) with hundreds of desires
तवयुष्मद् (६.१) your
धूर्तधूर्त (८.१) O rogue
कान्ताकान्ता (१.१) beloved
सातद् (१.१) that
एवएव only
स्थितास्थित (√स्था+क्त, १.१) situated
मनसिमनस् (७.१) in mind
कृत्रिम-भाव-रम्यकृत्रिमभावरम्य (१.१) charming with artificial feelings
अस्माकंअस्मद् (६.३) our
अस्तिअस्ति (√अस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) is
not
कथञ्चित्कथञ्चित् somehow
इहइह here
अवकाशंअवकाश (२.१) space/opportunity
तस्मात्तद् (५.१) therefore
कृतंकृत (√कृ+क्त, १.१) done/enough
चरण-पात-विडम्बनाभिःचरणपात–विडम्बना (३.३) with mockeries of falling at feet
छन्दः वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४
सा र्धं नो तै स्त धू र्त का न्ता
सै स्थि ता सि कृ त्रि भा म्या
स्मा स्ति ञ्चि दि हा का शं
स्मा त्कृ तं पा वि म्ब ना भिः
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