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क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्ण-
मन्नक्षये वर्धति जाठराग्निः ।
आपत्सु वैराणि समुद्भवन्ति
वामे विधौ सर्वमिदं नराणाम् ॥

अन्वयः AI क्षते प्रहाराः अभीक्ष्णम् निपतन्ति, अन्न-क्षये जाठर-अग्निः वर्धति, आपत्सु वैराणि समुद्भवन्ति; विधौ वामे (सति) नराणाम् इदम् सर्वम् (भवति)।
Summary AI Blows fall repeatedly upon a wound, hunger intensifies when food is scarce, and enmities arise during misfortunes. All these calamities befall men when fate is adverse.
सारांश AI घाव पर ही चोट लगती है, अन्न समाप्त होने पर भूख बढ़ जाती है और विपत्ति में शत्रु पैदा हो जाते हैं; भाग्य विपरीत होने पर मनुष्य के साथ ऐसा ही होता है।
पदच्छेदः AI
क्षतेक्षत (७.१) undefined
प्रहाराःप्रहार (१.३) undefined
निपतन्तिनिपतन्ति (नि√पत् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) undefined
अभीक्ष्णम्अभीक्ष्णम् undefined
अन्न-क्षयेअन्न-क्षय (७.१) undefined
वर्धतिवर्धति (√वृध् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) undefined
जाठर-अग्निःअग्नि (१.१) undefined
आपत्सुआपद् (७.३) undefined
वैराणिवैर (१.३) undefined
समुद्भवन्तिसमुद्भवन्ति (सम्+उत्√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) undefined
वामेवाम (७.१) undefined
विधौविधि (७.१) undefined
सर्वम्सर्व (१.१) undefined
इदम्इदम् (१.१) undefined
नराणाम्नर (६.३) undefined
छन्दः उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११
क्ष ते प्र हा रा नि न्त्य भी क्ष्ण
न्न क्ष ये र्ध ति जा रा ग्निः
त्सु वै रा णि मु द्भ न्ति
वा मे वि धौ र्व मि दं रा णाम्
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