के नाम न विनश्यन्ति मिथ्याज्ञानान्नितम्बिनीम् ।
रम्यां ते उपसर्पन्ति दीपाभां शलभा यथा ॥

अन्वयः AI के नाम मिथ्या-ज्ञानात् न विनश्यन्ति? यथा शलभाः दीपाभाम् (उपसर्पन्ति, तथा) ते रम्याम् नितम्बिनीम् उपसर्पन्ति।
Summary AI Who does not perish through false understanding? Just as moths are drawn to the glow of a lamp, men approach beautiful women and meet their ruin.
सारांश AI स्त्रियों के प्रति मोह और अज्ञान से कौन नष्ट नहीं होता? सुंदर स्त्री की ओर लोग वैसे ही खिंचे चले जाते हैं जैसे दीपक की लौ पर पतंगे।
पदच्छेदः AI
केकिम् (१.३) undefined
नामनाम undefined
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विनश्यन्तिविनश्यन्ति (वि√नश् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) undefined
मिथ्या-ज्ञानात्मिथ्या-ज्ञान (५.१) undefined
नितम्बिनीम्नितम्बिनी (२.१) undefined
रम्याम्रम्या (२.१) undefined
तेतत् (१.३) undefined
उपसर्पन्तिउपसर्पन्ति (उप√सृप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) undefined
दीप-आभाम्आभा (२.१) undefined
शलभाःशलभ (१.३) undefined
यथायथा undefined
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
के ना वि श्य न्ति
मि थ्या ज्ञा ना न्नि म्बि नीम्
म्यां ते र्प न्ति
दी पा भां भा था
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