अन्वयः
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काय-क्षालन-सम्भवैः अमृतस्य प्रवाहैः किम्? यः असौ चिरान् मित्र-परिष्वङ्गः मूल्य-विवर्जितः (अस्ति)।
Summary
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What is the use of streams of nectar produced for washing the body? The embrace of a long-lost friend is priceless and incomparable.
सारांश
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शरीर को स्वच्छ करने वाली अमृत की धाराओं से क्या लाभ? चिरकाल के बाद मित्र का आलिंगन ही वह सुख है जो वास्तव में अमूल्य है।
पदच्छेदः
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| अमृतस्य | अमृत (६.१) | of nectar |
| प्रवाहैः | प्रवाह (३.३) | by streams |
| किम् | किम् | what (is the use of) |
| काय-क्षालन-सम्भवैः | काय–क्षालन–सम्भव (३.३) | capable of washing the body |
| चिरात् | चिर (५.१) | long-lasting |
| मित्र-परिष्वङ्गः | मित्र–परिष्वङ्ग (१.१) | embrace of a friend |
| यः | यद् (१.१) | which |
| असौ | अदस् (१.१) | that |
| मूल्य-विवर्जितः | मूल्य–विवर्जित (१.१) | devoid of price, priceless |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | मृ | त | स्य | प्र | वा | हैः | किं |
| का | य | क्षा | ल | न | स | म्भ | वैः |
| चि | रा | न्मि | त्र | प | रि | ष्व | ङ्गो |
| यो | ऽसौ | मू | ल्य | वि | व | र्जि | तः |
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