अन्वयः
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पुरा शत्रुः भीत-भीतैः मन्दं मन्दं विसर्पति । पश्चात् भूमौ प्रहेलया अङ्गनासु जार-हस्तः इव ।
Summary
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Initially, an enemy approaches slowly and with great hesitation. Later, however, he moves boldly across the land, much like the unrestrained hand of a lover upon women.
सारांश
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शत्रु पहले डरे हुए व्यक्ति की तरह धीरे-धीरे प्रवेश करता है और फिर अनायास ही अधिकार जमा लेता है, जैसे पर-स्त्री के शरीर पर जार का हाथ।
पदच्छेदः
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| भीत-भीतैः | भीत (√भीत+क्त, ३.३)–भीत (√भीत+क्त, ३.३) | by those who are very afraid |
| पुरा | पुरा | formerly, initially |
| शत्रुः | शत्रु (१.१) | enemy |
| मन्दम् | मन्द (२.१) | slowly |
| मन्दम् | मन्द (२.१) | slowly |
| विसर्पति | विसर्पति (वि√सृप् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | moves, creeps |
| भूमौ | भूमि (७.१) | on the ground |
| प्रहेलया | प्रहेला (३.१) | with ease, freely |
| पश्चात् | पश्चात् | afterwards, later |
| जार-हस्तः | जार–हस्त (१.१) | lover's hand |
| अङ्गनासु | अङ्गना (७.३) | on women |
| इव | इव | like |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भी | त | भी | तैः | पु | रा | श | त्रु |
| र्म | न्दं | म | न्दं | वि | स | र्प | ति |
| भू | मौ | प्र | हे | ल | या | प | श्चा |
| ज्जा | र | ह | स्तो | ऽङ्ग | ना | स्वि | व |
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