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उप्रणं शरणं तद्वन्मन्यते भयवर्जितः ।
प्रवासं स्वपुरावासं स भवेद्राजवल्लभः ॥

अन्वयः AI यः भय-वर्जितः तद्वत् उग्रणं शरणं मन्यते, प्रवासं स्व-पुर-आवासं मन्यते, सः राज-वल्लभः भवेत् ।
Summary AI One who, free from fear, regards even a fierce threat as a refuge and treats living abroad as staying in his own city, becomes a favorite of the king.
सारांश AI जो निर्भय होकर कष्टों को आश्रय मानता है और परदेश में रहने को अपने घर जैसा समझता है, वह राजा का प्रिय होता है।
पदच्छेदः AI
उप्रणंउप्रण (२.१) undefined
शरणंशरण (२.१) undefined
तद्वत्तद्वत् undefined
मन्यतेमन्यते (√मन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) undefined
भयवर्जितःभयवर्जित (१.१) undefined
प्रवासंप्रवास (२.१) undefined
स्वपुरावासंस्वपुरआवास (२.१) undefined
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भवेत्भवेत् (√भू कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) undefined
राजवल्लभःराजवल्लभ (१.१) undefined
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
प्र णं णं द्व
न्म न्य ते र्जि तः
प्र वा सं स्व पु रा वा सं
वे द्रा ल्ल भः
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