अन्वयः
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यः नरः नर-नाथस्य द्वेषि-द्वेष-परः नित्यम् इष्टानाम् इष्ट-कर्म-कृत् भवति सः राज-वल्लभः भवेत्।
Summary
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That man who is always intent on hating the king's enemies and doing what is pleasing to the king's friends becomes a favorite of the king.
सारांश
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जो मनुष्य राजा के शत्रुओं से द्वेष करता है और राजा के प्रियजनों का सदा भला करता है, वही राजा का प्रिय पात्र होता है।
पदच्छेदः
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| द्वेषिद्वेषपरः | द्वेषिन्–द्वेष–पर (१.१) | undefined |
| नित्यम् | नित्य | undefined |
| इष्टानाम् | इष्ट (६.३) | undefined |
| इष्टकर्मकृत् | इष्ट–कर्म–कृत् (१.१) | undefined |
| यः | यद् (१.१) | undefined |
| नरः | नर (१.१) | undefined |
| नरनाथस्य | नर–नाथ (६.१) | undefined |
| स | तद् (१.१) | undefined |
| भवेत् | भवेत् (√भू कर्तरि विधिलिङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | undefined |
| राजवल्लभः | राज–वल्लभ (१.१) | undefined |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| द्वे | षि | द्वे | ष | प | रो | नि | त्य |
| मि | ष्टा | ना | मि | ष्ट | क | र्म | कृत् |
| यो | न | रो | न | र | ना | थ | स्य |
| स | भ | वे | द्रा | ज | व | ल्ल | भः |
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