कस्मिंश्चिद्वने शमी-वृक्ष-शाखालम्बित-वसथं कृत्वारण्य-चटक-दम्पती प्रतिवसतः स्म
अथ कदाचित्तयोः सुख-संस्थयोर्हेमन्त-मेघो मन्दं मन्दं वर्षितुमारब्धः
अत्रान्तरे कश्चिच्छाखा-मृगो वातासार-समाहतः प्रोद्धूषित-शरीरो दन्तवीणां वादयन्वेपमानस्तस्याः शम्या मूलमासाद्योपविष्टः
अथ तं तादृषमवलोक्य चटका प्राह-भो भद्र ! हस्त-पाद-समोपेतो दृश्यसे पुरुषाकृतिः
शीतेन भिद्यसे मूढ कथं न कुरुषे गृहम्
कस्मिंश्चिद्वने शमी-वृक्ष-शाखालम्बित-वसथं कृत्वारण्य-चटक-दम्पती प्रतिवसतः स्म
अथ कदाचित्तयोः सुख-संस्थयोर्हेमन्त-मेघो मन्दं मन्दं वर्षितुमारब्धः
अत्रान्तरे कश्चिच्छाखा-मृगो वातासार-समाहतः प्रोद्धूषित-शरीरो दन्तवीणां वादयन्वेपमानस्तस्याः शम्या मूलमासाद्योपविष्टः
अथ तं तादृषमवलोक्य चटका प्राह-भो भद्र ! हस्त-पाद-समोपेतो दृश्यसे पुरुषाकृतिः
शीतेन भिद्यसे मूढ कथं न कुरुषे गृहम्
अथ कदाचित्तयोः सुख-संस्थयोर्हेमन्त-मेघो मन्दं मन्दं वर्षितुमारब्धः
अत्रान्तरे कश्चिच्छाखा-मृगो वातासार-समाहतः प्रोद्धूषित-शरीरो दन्तवीणां वादयन्वेपमानस्तस्याः शम्या मूलमासाद्योपविष्टः
अथ तं तादृषमवलोक्य चटका प्राह-भो भद्र ! हस्त-पाद-समोपेतो दृश्यसे पुरुषाकृतिः
शीतेन भिद्यसे मूढ कथं न कुरुषे गृहम्
अन्वयः
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भोः भद्र! हस्त-पाद-समोपेतः पुरुषाकृतिः दृश्यसे। मूढ! शीतेन भिद्यसे, कथम् गृहम् न कुरुषे?
Summary
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In a forest, a pair of sparrows lived on a śamī tree. During a winter rain, a shivering monkey took shelter at the tree's base. The sparrow, seeing his human-like form, asked: "O good sir, you have hands and feet; why do you suffer in the cold and not build a house?"
सारांश
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ठंड और वर्षा से ठिठुरते बंदर को देखकर बया पक्षी ने कहा कि मनुष्य जैसी आकृति और हाथ-पैर होने पर भी तुम अपने रहने के लिए घर क्यों नहीं बनाते?
पदच्छेदः
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| कस्मिन्-चित् | किम्-चित् (७.१) | in some |
| वने | वन (७.१) | forest |
| शमी-वृक्ष-शाखा-लम्बित-वसथम् | शमी–वृक्ष–शाखा–लम्बित–वसथ (२.१) | a dwelling hanging from a Sami tree branch |
| कृत्वा | कृत्वा (√कृ+क्त्वा) | having made |
| अरण्य-चटक-दम्पती | अरण्य–चटक–दम्पति (१.२) | a pair of forest sparrows |
| प्रतिवसतः | प्रतिवसतः (प्रति√वस् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) | lived |
| स्म | स्म | particle indicating past tense |
| अथ | अथ | then |
| कदाचित् | कदाचित् | once |
| तयोः | तद् (६.२) | of those two |
| सुख-संस्थयोः | सुख–संस्थित (६.२) | comfortably situated |
| हेमन्त-मेघः | हेमन्त–मेघ (१.१) | winter cloud |
| मन्दम् | मन्द | slowly |
| मन्दम् | मन्द | slowly |
| वर्षितुम् | वर्षितुम् (√वृष्+तुमुन्) | to rain |
| आरब्धः | आरब्ध (आ√रभ्+क्त, १.१) | started |
| अत्र-अन्तरे | अत्र–अन्तर (७.१) | in the meantime |
| कश्चित् | किम्-चित् (१.१) | some |
| शाखा-मृगः | शाखा–मृग (१.१) | monkey |
| वात-आसार-समाहतः | वात–आसार–समाहत (१.१) | struck by a downpour of wind |
| प्रोद्धूषित-शरीरः | प्र–उद्–धूषित–शरीर (१.१) | with a trembling body |
| दन्त-वीणाम् | दन्त–वीणा (२.१) | teeth-lyre (chattering teeth) |
| वादयन् | वादयत् (√वाद्+शतृ, १.१) | playing |
| वेपमानः | वेपमान (√वेप्+शानच्, १.१) | trembling |
| तस्याः | तद् (६.१) | of that |
| शम्याः | शमी (६.१) | of Sami tree |
| मूलम् | मूल (२.१) | root/base |
| आसाद्य | आसाद्य (आ√सद्+ल्यप्) | having reached |
| उपविष्टः | उपविष्ट (उप√विश्+क्त, १.१) | sat down |
| अथ | अथ | then |
| तम् | तद् (२.१) | him |
| तादृशम् | तादृश (२.१) | such |
| अवलोक्य | अवलोक्य (अव√लोक्+ल्यप्) | having seen |
| चटका | चटका (१.१) | female sparrow |
| प्राह | प्राह (प्र√अह कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | said |
| भो | भो | O! |
| भद्र | भद्र (८.१) | good sir! |
| हस्त-पाद-समोपेतः | हस्त–पाद–समोपेत (१.१) | endowed with hands and feet |
| दृश्यसे | दृश्यसे (√दृश् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are seen |
| पुरुष-आकृतिः | पुरुष–आकृति (१.१) | having the form of a man |
| शीतेन | शीत (३.१) | by cold |
| भिद्यसे | भिद्यसे (√भिद् भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you are afflicted |
| मूढ | मूढ (८.१) | O fool! |
| कथम् | कथम् | why |
| न | न | not |
| कुरुषे | कुरुषे (√कृ कर्तरि लट् (आत्मने.) म.पु. एक.) | you make |
| गृहम् | गृह (२.१) | house |
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