अन्वयः
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प्रजा-पीडन-सन्तापात् समुद्भूतः हुताशनः राज्ञः श्रियम् कुलम् प्राणान् न अदग्ध्वा न विनिवर्तते ।
Summary
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The fire born from the suffering of oppressed subjects does not subside without consuming the king's fortune, family, and very life.
सारांश
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प्रजा के उत्पीड़न और कष्टों से उत्पन्न होने वाली अग्नि राजा के ऐश्वर्य, कुल और उसके प्राणों को पूरी तरह जलाए बिना शांत नहीं होती।
पदच्छेदः
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| प्रजा-पीडन-सन्तापात् | प्रजा–पीडन–सन्ताप (५.१) | from the torment of oppressing subjects |
| समुद्भूतः | समुद्भूत (सम्+उत्√भू+क्त, १.१) | arisen |
| हुताशनः | हुताशन (१.१) | fire |
| राज्ञः | राजन् (६.१) | of the king |
| श्रियं | श्री (२.१) | prosperity/wealth |
| कुलं | कुल (२.१) | family/lineage |
| प्राणान् | प्राण (२.३) | lives |
| नादग्ध्वा | – | undefined |
| विनिवर्तते | विनिवर्तते (वि+नि√वृत् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | returns/ceases |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | जा | पी | ड | न | स | न्ता | पा |
| त्स | मु | द्भू | तो | हु | ता | श | नः |
| रा | ज्ञः | श्रि | यं | कु | लं | प्रा | णा |
| न्ना | द | ग्ध्वा | वि | नि | व | र्त | ते |
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