घोषे क्वापि पुरा पयः कियदपि स्तैन्येन दैन्येन वा
लब्धं योऽवहदीश्वरोऽपि जगतां जन्माधमं मानुषम् ।
तं विस्मापयितुं तरङ्गवलयैर्घोषानसंख्यान्सृज
न्नाभूभूतलसंभृतेन पयसैवावृत्य यो वर्तते ॥
घोषे क्वापि पुरा पयः कियदपि स्तैन्येन दैन्येन वा
लब्धं योऽवहदीश्वरोऽपि जगतां जन्माधमं मानुषम् ।
तं विस्मापयितुं तरङ्गवलयैर्घोषानसंख्यान्सृज
न्नाभूभूतलसंभृतेन पयसैवावृत्य यो वर्तते ॥
लब्धं योऽवहदीश्वरोऽपि जगतां जन्माधमं मानुषम् ।
तं विस्मापयितुं तरङ्गवलयैर्घोषानसंख्यान्सृज
न्नाभूभूतलसंभृतेन पयसैवावृत्य यो वर्तते ॥
विस्तारः
भुवं भूतलं (पाताल) चाभिव्याप्य आभूभूतलम् ।
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घो | षे | क्वा | पि | पु | रा | प | यः | कि | य | द | पि | स्तै | न्ये | न | दै | न्ये | न | वा |
| ल | ब्धं | यो | ऽव | ह | दी | श्व | रो | ऽपि | ज | ग | तां | ज | न्मा | ध | मं | मा | नु | षम् |
| तं | वि | स्मा | प | यि | तुं | त | र | ङ्ग | व | ल | यै | र्घो | षा | न | सं | ख्या | न्सृ | ज |
| न्ना | भू | भू | त | ल | सं | भृ | ते | न | प | य | सै | वा | वृ | त्य | यो | व | र्त | ते |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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