अन्वयः
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(अहम्) पितामह-महेश्वरौ देवौ शिरसा प्रणम्य, ब्रह्मणा यत् उदाहृतम् (तत्) नाट्यशास्त्रम् प्रवक्ष्यामि ।
Summary
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Having bowed my head to the two gods, Brahma and Maheshvara, I will now expound on the Natyashastra, which was articulated by Brahma.
पदच्छेदः
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| प्रणम्य | प्रणम्य (प्र√नम्+ल्यप्) | having bowed |
| शिरसा | शिरस् (३.१) | with the head |
| देवौ | देव (२.२) | the two gods |
| पितामहमहेश्वरौ | पितामह–महेश्वर (२.२) | Brahma and Maheshvara |
| नाट्यशास्त्रम् | नाट्य–शास्त्र (२.१) | the Natyashastra |
| प्रवक्ष्यामि | प्रवक्ष्यामि (प्र√वच् कर्तरि लृट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I will expound |
| ब्रह्मणा | ब्रह्मन् (३.१) | by Brahma |
| यत् | यद् (१.१) | which |
| उदाहृतम् | उदाहृत (उद्+आ√हृ+क्त, १.१) | was spoken |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | ण | म्य | शि | र | सा | दे | वौ |
| पि | ता | म | ह | म | हे | श्व | रौ |
| ना | ट्य | शा | स्त्रं | प्र | व | क्ष्या | मि |
| ब्र | ह्म | णा | य | दु | दा | हृ | तम् |
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