न काकुवाक्यैरतिवाममङ्गजं
द्विषत्सु याचे पवनं तु दक्षिणम् ।
दिशापि मद्भस्म किरत्वयं तया
प्रियो यया वैरविधिर्वधावधिः ॥
न काकुवाक्यैरतिवाममङ्गजं
द्विषत्सु याचे पवनं तु दक्षिणम् ।
दिशापि मद्भस्म किरत्वयं तया
प्रियो यया वैरविधिर्वधावधिः ॥
द्विषत्सु याचे पवनं तु दक्षिणम् ।
दिशापि मद्भस्म किरत्वयं तया
प्रियो यया वैरविधिर्वधावधिः ॥
अन्वयः
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द्विषत्सु (अपि) काकु-वाक्यैः अति-वामम् अङ्गजम् न याचे । दक्षिणम् पवनम् तु याचे । अयम् (पवनः) तया दिशा अपि मत्-भस्म किरतु यया प्रियः (अस्ति), (यया सह मम) वैर-विधिः वध-अवधिः (अस्ति) ।
Summary
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I do not beg the cruel Kama with plaintive words, as one would not even an enemy. But I do beg the southern wind. Let this wind scatter my ashes in that very direction where my beloved is, with whom my course of hostility (due to his absence) will only end with my death.
पदच्छेदः
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| न | न | not |
| काकुवाक्यैः | काकु–वाक्य (३.३) | with plaintive words |
| अतिवामम् | अति–वाम (२.१) | the very cruel |
| अङ्गजम् | अङ्गज (२.१) | Kama |
| द्विषत्सु | द्विषत् (७.३) | towards enemies |
| याचे | याचे (√याच् कर्तरि लट् (आत्मने.) उ.पु. एक.) | I beg |
| पवनम् | पवन (२.१) | the wind |
| तु | तु | but |
| दक्षिणम् | दक्षिण (२.१) | the southern |
| दिशा | दिश् (३.१) | in the direction |
| अपि | अपि | also |
| मद्भस्म | मत्–भस्म (२.१) | my ashes |
| किरतु | किरतु (√कॄ कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | let it scatter |
| अयम् | इदम् (१.१) | this (wind) |
| तया | तद् (३.१) | in that |
| प्रियः | प्रिय (१.१) | the beloved |
| यया | यद् (३.१) | in which |
| वैरविधिः | वैर–विधि (१.१) | the course of hostility |
| वधावधिः | वध–अवधि (१.१) | which has death as its limit |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | का | कु | वा | क्यै | र | ति | वा | म | म | ङ्ग | जं |
| द्वि | ष | त्सु | या | चे | प | व | नं | तु | द | क्षि | णम् |
| दि | शा | पि | म | द्भ | स्म | कि | र | त्व | यं | त | या |
| प्रि | यो | य | या | वै | र | वि | धि | र्व | धा | व | धिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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