दृशौ मृषा पातकिनो मनोरथाः
कथं पृथू वामपि विप्रलेभिरे ।
प्रियश्रियः प्रेक्षणघाति पातकं
स्वमश्रुभिः क्षालयतं शतं समाः ॥
दृशौ मृषा पातकिनो मनोरथाः
कथं पृथू वामपि विप्रलेभिरे ।
प्रियश्रियः प्रेक्षणघाति पातकं
स्वमश्रुभिः क्षालयतं शतं समाः ॥
कथं पृथू वामपि विप्रलेभिरे ।
प्रियश्रियः प्रेक्षणघाति पातकं
स्वमश्रुभिः क्षालयतं शतं समाः ॥
अन्वयः
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दृशौ ! पातकिनः मृषा मनोरथाः पृथू वाम् अपि कथम् विप्रलेभिरे? प्रिय-श्रियः प्रेक्षण-घाति स्वम् पातकम् शतम् समाः अश्रुभिः क्षालयतम् ।
Summary
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O my eyes! How did my sinful, false desires deceive even you, who are so large? Now, for a hundred years, wash away with your tears your own sin which has destroyed the sight of my beloved's beauty.
पदच्छेदः
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| दृशौ | दृश् (८.२) | O my two eyes |
| मृषा | मृषा | falsely |
| पातकिनः | पातकिन् (१.३) | sinful |
| मनोरथाः | मनोरथ (१.३) | desires |
| कथम् | कथम् | how |
| पृथू | पृथु (२.२) | large |
| वाम् | युष्मद् (२.२) | you two |
| अपि | अपि | even |
| विप्रलेभिरे | विप्रलेभिरे (वि+प्र√लभ् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. बहु.) | deceived |
| प्रियश्रियः | प्रिय–श्री (६.१) | of the beauty of the beloved |
| प्रेक्षणघाति | प्रेक्षण–घातिन् (२.१) | which destroys the seeing |
| पातकम् | पातक (२.१) | sin |
| स्वम् | स्व (२.१) | your own |
| अश्रुभिः | अश्रु (३.३) | with tears |
| क्षालयतम् | क्षालयतम् (√क्षाल् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. द्वि.) | wash away |
| शतम् | शत (२.१) | a hundred |
| समाः | समा (२.३) | years |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दृ | शौ | मृ | षा | पा | त | कि | नो | म | नो | र | थाः |
| क | थं | पृ | थू | वा | म | पि | वि | प्र | ले | भि | रे |
| प्रि | य | श्रि | यः | प्रे | क्ष | ण | घा | ति | पा | त | कं |
| स्व | म | श्रु | भिः | क्षा | ल | य | तं | श | तं | स | माः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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