स्वात्मापि शीलेन तृणं विधेयं
देया विहायासनभूर्निजापि ।
आनन्दबाष्पैरपि कल्प्यमम्भः
पृच्छा विधेया मधुभिर्वचोभिः ॥
स्वात्मापि शीलेन तृणं विधेयं
देया विहायासनभूर्निजापि ।
आनन्दबाष्पैरपि कल्प्यमम्भः
पृच्छा विधेया मधुभिर्वचोभिः ॥
देया विहायासनभूर्निजापि ।
आनन्दबाष्पैरपि कल्प्यमम्भः
पृच्छा विधेया मधुभिर्वचोभिः ॥
अन्वयः
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शीलेन स्व-आत्मा अपि तृणम् विधेयः । निजा आसन-भूः अपि विहाय देया । आनन्द-बाष्पैः अपि अम्भः कल्प्यम् । मधुभिः वचोभिः पृच्छा विधेया ।
Summary
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Through humility, one's own self should be made as insignificant as grass. Even one's own seat should be given up and offered. Water can be provided even with tears of joy, and inquiries about well-being should be made with sweet words.
पदच्छेदः
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| स्वात्मापि | स्व–आत्मन् (१.१)–अपि | even one's own self |
| शीलेन | शील (३.१) | through humility |
| तृणम् | तृण (२.१) | like grass |
| विधेयम् | विधेय (वि√धा+यत्, १.१) | to be made |
| देया | देय (√दा+यत्, १.१) | to be given |
| विहाय | विहाय (वि√हा+ल्यप्) | having left |
| आसनभूः | आसनभू (१.१) | one's own seat |
| निजापि | निजा (१.१)–अपि | even one's own |
| आनन्दबाष्पैरपि | आनन्द–बाष्प (३.३)–अपि | even with tears of joy |
| कल्प्यम् | कल्प्य (√कृप्+ण्यत्, १.१) | to be prepared |
| अम्भः | अम्भस् (१.१) | water |
| पृच्छा | पृच्छा (१.१) | inquiry |
| विधेया | विधेय (वि√धा+यत्, १.१) | to be made |
| मधुभिः | मधु (३.३) | sweet |
| वचोभिः | वचस् (३.३) | with words |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वा | त्मा | पि | शी | ले | न | तृ | णं | वि | धे | यं |
| दे | या | वि | हा | या | स | न | भू | र्नि | जा | पि |
| आ | न | न्द | बा | ष्पै | र | पि | क | ल्प्य | म | म्भः |
| पृ | च्छा | वि | धे | या | म | धु | भि | र्व | चो | भिः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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