त्वदितरो न हृदापि मया धृतः
पतिरितीव नलं हृदयेशयम् ।
स्मरहविर्भुजि बोधयति स्म सा
विरहपाण्डुतया निजशुद्धताम् ॥
त्वदितरो न हृदापि मया धृतः
पतिरितीव नलं हृदयेशयम् ।
स्मरहविर्भुजि बोधयति स्म सा
विरहपाण्डुतया निजशुद्धताम् ॥
पतिरितीव नलं हृदयेशयम् ।
स्मरहविर्भुजि बोधयति स्म सा
विरहपाण्डुतया निजशुद्धताम् ॥
अन्वयः
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सा विरहपाण्डुतया, "त्वत्-इतरः पतिः मया हृदा अपि न धृतः" इति इव, स्मरहविर्भुजि हृदयेशयम् नलम् निजशुद्धताम् बोधयति स्म ।
Summary
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Through the paleness caused by separation, she seemed to be informing Nala, who dwelt in her heart, of her purity in the fire of love, as if declaring, 'No husband other than you has been held by me, even in my heart.'
पदच्छेदः
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| त्वत्-इतरः | त्वत्–इतर (१.१) | other than you |
| न | न | not |
| हृदा | हृद् (३.१) | by heart |
| अपि | अपि | even |
| मया | अस्मद् (३.१) | by me |
| धृतः | धृत (√धृ+क्त, १.१) | held |
| पतिः | पति (१.१) | as husband |
| इति | इति | thus |
| इव | इव | as if |
| नलम् | नल (२.१) | to Nala |
| हृदयेशयम् | हृदयेशय (२.१) | who dwells in her heart |
| स्मरहविर्भुजि | स्मरहविर्भुज् (७.१) | in the fire of love |
| बोधयति | बोधयति (√बुध् +णिच् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | was informing |
| स्म | स्म | (past tense marker) |
| सा | तद् (१.१) | she |
| विरहपाण्डुतया | विरहपाण्डुता (३.१) | by the paleness of separation |
| निजशुद्धताम् | निजशुद्धता (२.१) | her own purity |
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | दि | त | रो | न | हृ | दा | पि | म | या | धृ | तः |
| प | ति | रि | ती | व | न | लं | हृ | द | ये | श | यम् |
| स्म | र | ह | वि | र्भु | जि | बो | ध | य | ति | स्म | सा |
| वि | र | ह | पा | ण्डु | त | या | नि | ज | शु | द्ध | ताम् |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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