अस्यर्थहेतिपटुताकवलीभवत्त-
त्तत्पार्थिवाधिकरणप्रभवाऽस्य भूतिः ।
अप्यङ्गरागजननाय महेश्वरस्य
संजायते रुचिरकर्णि तपस्विनोऽपि ॥
अस्यर्थहेतिपटुताकवलीभवत्त-
त्तत्पार्थिवाधिकरणप्रभवाऽस्य भूतिः ।
अप्यङ्गरागजननाय महेश्वरस्य
संजायते रुचिरकर्णि तपस्विनोऽपि ॥
त्तत्पार्थिवाधिकरणप्रभवाऽस्य भूतिः ।
अप्यङ्गरागजननाय महेश्वरस्य
संजायते रुचिरकर्णि तपस्विनोऽपि ॥
अन्वयः
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रुचिरकर्णि, अस्य असि-अर्थ-हेति-पटुता-कवलीभवत्-तत्-तत्-पार्थिव-अधिकरण-प्रभवा भूतिः तपस्विनः अपि महेश्वरस्य अङ्गराग-जननाय अपि संजायते ।
Summary
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O lady with beautiful ears, his (Agni's) sacred ash, produced from the territories of various kings consumed by the prowess of his sword-like flames, serves also as the body-ointment for even the ascetic Lord Shiva.
पदच्छेदः
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| अस्यर्थहेतिपटुताकवलीभवत्तत्तत्पार्थिवाधिकरणप्रभवा | असि–अर्थ–हेति–पटुता–कवलीभवत् (√भू+शतृ)–तद्–तद्–पार्थिव–अधिकरण–प्रभव (प्र√भू+अ, १.१) | produced from the territories of various kings consumed by the prowess of his sword-like flames |
| अस्य | इदम् (६.१) | his |
| भूतिः | भूति (१.१) | sacred ash |
| अपि | अपि | also |
| अङ्गरागजननाय | अङ्गराग–जनन (४.१) | for the purpose of body-ointment |
| महेश्वरस्य | महेश्वर (६.१) | of Lord Shiva |
| संजायते | संजायते (सम्√जन् कर्तरि लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| रुचिरकर्णि | रुचिर–कर्ण (८.१) | O lady with beautiful ears |
| तपस्विनः | तपस्विन् (६.१) | of the ascetic |
| अपि | अपि | even |
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | स्य | र्थ | हे | ति | प | टु | ता | क | व | ली | भ | व | त्त |
| त्त | त्पा | र्थि | वा | धि | क | र | ण | प्र | भ | वा | ऽस्य | भू | तिः |
| अ | प्य | ङ्ग | रा | ग | ज | न | ना | य | म | हे | श्व | र | स्य |
| सं | जा | य | ते | रु | चि | र | क | र्णि | त | प | स्वि | नो | ऽपि |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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