तदेव किं न क्रियते नु का क्षति-
र्यदेष तद्दूतमुखेन काङ्क्षति ।
प्रसीद काञ्चीमयमाच्छिनत्तु ते
प्रसह्य काञ्चीपुरभूपुरंदरः ॥
तदेव किं न क्रियते नु का क्षति-
र्यदेष तद्दूतमुखेन काङ्क्षति ।
प्रसीद काञ्चीमयमाच्छिनत्तु ते
प्रसह्य काञ्चीपुरभूपुरंदरः ॥
र्यदेष तद्दूतमुखेन काङ्क्षति ।
प्रसीद काञ्चीमयमाच्छिनत्तु ते
प्रसह्य काञ्चीपुरभूपुरंदरः ॥
अन्वयः
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एषः यत् तत् दूतमुखेन काङ्क्षति, तत् एव नु किम् न क्रियते? का क्षतिः? प्रसीद। अयम् काञ्चीपुरभूपुरंदरः ते काञ्चीम् प्रसह्य आच्छिनत्तु।
Summary
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'Why not do that which this king desires through his messenger? What is the harm? Be pleased! Let this Indra among the kings of Kanchipura forcibly snatch your girdle.' This provocative statement suggests the king's immense power and desire.
पदच्छेदः
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| तत् | तद् (१.१) | That |
| एव | एव | indeed |
| किम् | किम् | why |
| न | न | not |
| क्रियते | क्रियते (√कृ भावकर्मणोः लट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | is done |
| नु | नु | surely |
| का | किम् (१.१) | what |
| क्षतिः | क्षति (१.१) | harm |
| यत् | यद् | that which |
| एषः | एतद् (१.१) | this one |
| तत् | तद् (२.१) | that |
| दूतमुखेन | दूत–मुख (३.१) | through the mouth of a messenger |
| काङ्क्षति | काङ्क्षति (√काङ्क्ष् कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | desires |
| प्रसीद | प्रसीद (प्र√सद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) म.पु. एक.) | be pleased |
| काञ्चीम् | काञ्ची (२.१) | girdle |
| अयम् | इदम् (१.१) | this one |
| आच्छिनत्तु | आच्छिनत्तु (आ√छिद् कर्तरि लोट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | may he snatch |
| ते | युष्मद् (६.१) | your |
| प्रसह्य | प्रसह्य (प्र√सह्+ल्यप्) | by force |
| काञ्चीपुरभूपुरंदरः | काञ्चीपुर–भू–पुरंदर (१.१) | the Indra among the kings of Kanchipura |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | दे | व | किं | न | क्रि | य | ते | नु | का | क्ष | ति |
| र्य | दे | ष | त | द्दू | त | मु | खे | न | का | ङ्क्ष | ति |
| प्र | सी | द | का | ञ्ची | म | य | मा | च्छि | न | त्तु | ते |
| प्र | स | ह्य | का | ञ्ची | पु | र | भू | पु | रं | द | रः |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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