अथ स्वमादाय भयेन मन्थना-
च्चिरत्नरत्नाधिकमुच्चितं चिरात् ।
निलीय तस्मिन्निव सन्नपांनिधि-
र्वने तडाको ददृशेऽवनीभुजा ॥
अथ स्वमादाय भयेन मन्थना-
च्चिरत्नरत्नाधिकमुच्चितं चिरात् ।
निलीय तस्मिन्निव सन्नपांनिधि-
र्वने तडाको ददृशेऽवनीभुजा ॥
च्चिरत्नरत्नाधिकमुच्चितं चिरात् ।
निलीय तस्मिन्निव सन्नपांनिधि-
र्वने तडाको ददृशेऽवनीभुजा ॥
अन्वयः
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अथ वने अवनीभुजा तडाकः ददृशे। सः तडाकः मन्थनात् भयेन, चिरात् उच्चितम् चिरत्नरत्नाधिकम् स्वम् आदाय तस्मिन् वने निलीय सन् अपाम्निधिः इव आसीत्।
Summary
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Then, the king (Nala) saw a lake in the forest. It appeared as if it were the ocean itself, which, out of fear of being churned again, had taken its long-collected wealth—greater than its ancient gems—and was hiding there.
पदच्छेदः
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| अथ | अथ | then |
| स्वम् | स्व (२.१) | his own wealth |
| आदाय | आदाय (आ√दा+ल्यप्) | having taken |
| भयेन | भय (३.१) | out of fear |
| मन्थनात् | मन्थन (५.१) | from the churning |
| चिरत्नरत्नाधिकम् | चिरत्न–रत्न–अधिक (२.१) | more than the ancient gems |
| उच्चितम् | उच्चित (उद्√चि+क्त, २.१) | collected |
| चिरात् | चिरात् | for a long time |
| निलीय | निलीय (नि√ली+ल्यप्) | having hidden |
| तस्मिन् | तद् (७.१) | in that |
| इव | इव | as if |
| सन् | सत् (√अस्+शतृ, १.१) | being |
| अपाम्निधिः | अपाम्–निधि (१.१) | the ocean |
| वने | वन (७.१) | in the forest |
| तडाकः | तडाक (१.१) | a lake |
| ददृशे | ददृशे (√दृश् भावकर्मणोः लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | was seen |
| अवनीभुजा | अवनीभुज् (३.१) | by the king |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थ | स्व | मा | दा | य | भ | ये | न | म | न्थ | ना |
| च्चि | र | त्न | र | त्ना | धि | क | मु | च्चि | तं | चि | रात् |
| नि | ली | य | त | स्मि | न्नि | व | स | न्न | पां | नि | धि |
| र्व | ने | त | डा | को | द | दृ | शे | ऽव | नी | भु | जा |
| ज | त | ज | र | ||||||||
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