नवीनेयं सम्प्रत्यकुशलपरीपाकलहरी-
निरीणर्ति स्वैरं मम सहचरीचित्तकुहरे ।
जगन्नेत्रश्रेणीमधुरमथुरायां निवसत-
श्चिरादार्ता वार्तामपि तव यदेषा न लभते ॥
नवीनेयं सम्प्रत्यकुशलपरीपाकलहरी-
निरीणर्ति स्वैरं मम सहचरीचित्तकुहरे ।
जगन्नेत्रश्रेणीमधुरमथुरायां निवसत-
श्चिरादार्ता वार्तामपि तव यदेषा न लभते ॥
निरीणर्ति स्वैरं मम सहचरीचित्तकुहरे ।
जगन्नेत्रश्रेणीमधुरमथुरायां निवसत-
श्चिरादार्ता वार्तामपि तव यदेषा न लभते ॥
अन्वयः
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सम्प्रति इयम् नवीना अकुशल-परीपाक-लहरी मम सहचरी-चित्त-कुहरे स्वैरम् निरीणर्ति। जगत्-नेत्र-श्रेणी-मधुर-मथुरायाम् निवसत: तव वार्ताम् अपि एषा यत् चिरात् आर्ता न लभते॥
Summary
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Presently, a new wave of ripening misfortune is freely emerging within the cavity of my friend's heart. This is because, distressed as she is, she has not received even a word from you for a long time, while you dwell in Mathurā, which is sweet to the eyes of the entire world.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| न | वी | ने | यं | स | म्प्र | त्य | कु | श | ल | प | री | पा | क | ल | ह | री |
| नि | री | ण | र्ति | स्वै | रं | म | म | स | ह | च | री | चि | त्त | कु | ह | रे |
| ज | ग | न्ने | त्र | श्रे | णी | म | धु | र | म | थु | रा | यां | नि | व | स | त |
| श्चि | रा | दा | र्ता | वा | र्ता | म | पि | त | व | य | दे | षा | न | ल | भ | ते |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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